तुलसी विवाह 2026: विधि, सामग्री, गन्ने का मंडप और बिहार-महाराष्ट्र-गुजरात-आंध्र की परंपरा

तुलसी विवाह वह पर्व है जिसमें घर के आँगन में खड़ी तुलसी की झाड़ी को दुल्हन की तरह सजाकर शालिग्राम (विष्णु) से ब्याह दिया जाता है। यह कार्तिक मास में, प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच किसी शुभ दिन होता है।
यह पूरे भारत में मनाया जाता है, पर चार जगहों पर इसका रूप बिल्कुल अलग है — बिहार-मिथिला का सौंजा छपन भोग, महाराष्ट्र का मंगल अष्टक, गुजरात की तुलसी-नो-बारात और आंध्र-तेलंगाना की क्षीराब्धि द्वादशी। यह गाइड चारों को अलग-अलग बताती है।
तुलसी विवाह 2026: तिथि और कथा
तुलसी विवाह कार्तिक मास में होता है — प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक के बीच। ज़्यादातर घरों में इसे एकादशी या पूर्णिमा को किया जाता है, और क्षेत्र के अनुसार तारीख तय होती है।
कथा: वृंदा नाम की स्त्री जलंधर दैत्य की पत्नी थी और विष्णु की परम भक्त। जलंधर का वध करने के लिए विष्णु ने वृंदा के पति का रूप धारण किया। सत्य जानकर वृंदा ने विष्णु को शिला (पत्थर) बन जाने का शाप दिया और स्वयं देह त्याग दी। तब विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे तुलसी के रूप में सबके घरों में पूजी जाएँगी और हर साल उनसे विवाह करेंगे। तभी से शालिग्राम के साथ तुलसी का विवाह होता है।
इसीलिए तुलसी को "वृंदा" भी कहा जाता है, और शालिग्राम-तुलसी का जोड़ा विष्णु-लक्ष्मी का ही रूप माना जाता है।
- तुलसी विवाह = कार्तिक मास, प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच
- वर = शालिग्राम (या विष्णु/कृष्ण की मूर्ति), वधू = तुलसी (वृंदा)
- कथा: वृंदा का शाप और विष्णु का वरदान
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विधि: गन्ने का मंडप और तुलसी का श्रृंगार
तुलसी के चबूतरे को उस दिन विवाह मंडप की तरह सजाया जाता है। मंडप के चारों कोनों पर गन्ने की डंडियाँ गाड़ी जाती हैं और उन्हें आम के पत्तों, केले के पत्तों तथा फूलों से बाँधा जाता है। अमरूद, आँवला, बेर और मौसमी फल डालियों पर लटकाए जाते हैं।
तुलसी की झाड़ी को लाल-हरे वस्त्र, चूड़ी, बिंदी, कुमकुम, हल्दी और फूलों से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। साथ में एक पात्र में शालिग्राम या विष्णु-कृष्ण की मूर्ति रखी जाती है — कहीं लकड़ी की, कहीं धातु की, कहीं चाँदी की तुलसी खड़ी रखी जाती है।
पूजा में दीप, कपूर, अगरबत्ती, पान-सुपारी, नारियल, बताशा, मिठाई और मौसमी फल चढ़ाए जाते हैं। कई घरों में पुरोहित जी से विवाह संस्कार कराया जाता है, तो कई घरों में घर की महिलाएँ स्वयं विधि करती हैं।
- गन्ने की डंडियाँ — मंडप के चार स्तंभ (सबसे पहचाना जाने वाला चिह्न)
- आम व केले के पत्ते, फूलों की माला, आँवला, बेर, अमरूद व मौसमी फल
- तुलसी श्रृंगार: लाल-हरा वस्त्र, चूड़ी, बिंदी, कुमकुम, हल्दी, नथ या आभूषण
- शालिग्राम / विष्णु-कृष्ण मूर्ति या चाँदी की तुलसी खड़ी
- पूजा: दीप, कपूर, अगरबत्ती, पान-सुपारी, नारियल, बताशा, मिठाई, फल
- प्रसाद व भोग: खीर, पूरी, सत्तू, तिल के लड्डू, गुड़, चना
बिहार और मिथिला: सौंजा छपन भोग
बिहार — विशेषकर मिथिलांचल में — तुलसी विवाह का सबसे विशिष्ट रूप मिलता है। विवाह की रात के बाद अगली सुबह "सौंजा छपन भोग" होता है: छप्पन (56) प्रकार की वस्तुएँ छोटी-छोटी मिट्टी की मटकियों या भाँड़ों में सजाकर तुलसी के चबूतरे पर अर्पित की जाती हैं।
सौंजा का संबंध बाँस के झुरमुट (सौंजा) से भी माना जाता है, जहाँ यह भोग रखा जाता है। भोग में मड़ुआ की रोटी, चिूरा, लाई, खील, बेर, आँवला, ठेकुआ जैसी परंपरागत मिठाइयाँ और अनाज के 56 प्रकार शामिल होते हैं — हर घर में सूची अपनी होती है।
मिथिला में इस अवसर पर गाए जाने वाले विवाह गीत और तुलसी विवाह की लोककथाएँ पीढ़ियों से चली आ रही हैं।
- सौंजा छपन भोग — तुलसी विवाह के अगले दिन, 56 प्रकार की वस्तुएँ
- मिट्टी के छोटे भाँड़ों में सजाकर माँगलिक भोग
- मड़ुआ की रोटी, चिूरा, लाई, खील, ठेकुआ, बेर, आँवला
- लोकगीत व विवाह की परंपरागत कथाएँ
महाराष्ट्र: तुलसीचा लग्न और मंगल अष्टक
महाराष्ट्र में तुलसी विवाह को "तुलसीचा लग्न" कहा जाता है और इसे मुख्यतः कार्तिक पूर्णिमा को किया जाता है। महिलाएँ तुलसी की वृंदावन को सजाकर विष्णु या शालिग्राम के साथ विवाह कराती हैं, और इस दिन "मंगल अष्टक" का पाठ किया जाता है।
मंगल अष्टक विवाहित जीवन की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए पढ़ा जाने वाला मराठी स्तोत्र है — इसलिए यह विधि मुख्यतः विवाहित महिलाएँ करती हैं। घर में तुलसी के पास दीप जलाकर पूजा होती है और महिलाएँ एक-दूसरे को हळद-कुंकू देती हैं।
पूणे और मुंबई क्षेत्र के महाराष्ट्रीयन घरों में इस दिन तुलसी की विशेष पूजा और सुग्रास भोज का आयोजन होता है।
- तुलसीचा लग्न = महाराष्ट्र में तुलसी विवाह, मुख्यतः कार्तिक पूर्णिमा
- मंगल अष्टक का पाठ — पति की दीर्घायु व सुख-समृद्धि हेतु
- विवाहित महिलाएँ मुख्य रूप से करती हैं, हळद-कुंकू विनिमय
- तुलसी वृंदावन का श्रृंगार और घर में विशेष पूजा
गुजरात: तुलसी-नो-बारात
गुजरात में तुलसी विवाह का रूप और भी उत्सवपूर्ण है — यहाँ बारात निकालने की परंपरा है। वडोदरा, अहमदाबाद और सौराष्ट्र के अनेक इलाकों में तुलसी के लिए "बारात" सजाई जाती है, जिसमें बच्चे, ढोल, बैंड और सजे हुए रथ शामिल होते हैं।
गुजरात में इसे "तुलसी नो लग्न" या "तुलसी विवाह" कहा जाता है और कार्तिक पूर्णिमा तथा देवउठनी एकादशी दोनों पर कई घरों में आयोजन होता है। विधि में पान-सुपारी, नारियल, मिठाई, फल और गन्ना प्रमुख हैं।
चूँकि गुजरात में तुलसी को लक्ष्मी का रूप माना जाता है, इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजा का भाव भी जुड़ा रहता है।
- तुलसी-नो-बारात — सजी बारात के साथ तुलसी विवाह
- वडोदरा, अहमदाबाद, सौराष्ट्र में विशेष लोकप्रिय
- पान-सुपारी, नारियल, मिठाई, फल, गन्ना मुख्य अर्पण
- तुलसी को लक्ष्मी का रूप मानकर लक्ष्मी-भाव से पूजा
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: क्षीराब्धि द्वादशी
तेलुगु क्षेत्र में तुलसी विवाह मुख्यतः कार्तिक शुक्ल द्वादशी को होता है और इसे "क्षीराब्धि द्वादशी" तथा "उत्थान द्वादशी" कहा जाता है। घर के आँगन में "तुलसी हरिविल्लु" (मंडप) बनाया जाता है — कई स्तंभों वाला ढाँचा, जिसे हल्दी, कुमकुम और फूलों से सजाया जाता है।
तुलसी को कृष्ण के साथ ब्याहा जाता है और द्वादशी से पूर्णिमा तक कार्तिक मास की पूजा चलती है। क्षीराब्धि का अर्थ क्षीर सागर है — इस दिन भगवान शयन से उठते हैं, इसलिए यह देवउठनी का ही दक्षिणी रूप है।
प्रसाद में पायस (खीर), पूरी, वडा, पुलिहोरा और मौसमी फल दिए जाते हैं। घरों में चावल के आटे से की गई मूर्तियाँ और "मुग्गुलु" (दीपों की माला) भी सजाई जाती हैं।
- क्षीराब्धि / उत्थान द्वादशी — कार्तिक शुक्ल द्वादशी
- तुलसी हरिविल्लु — हल्दी-कुमकुम से सजा कई स्तंभों वाला मंडप
- कृष्ण के साथ तुलसी का विवाह, द्वादशी से पूर्णिमा तक पूजा
- प्रसाद: पायस, पूरी, वडा, पुलिहोरा, मौसमी फल
उत्तर भारत और घर पर तुलसी विवाह कैसे करें
उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में तुलसी विवाह आम तौर पर देवउठनी एकादशी या कार्तिक पूर्णिमा को होता है। घर के आँगन में गन्ने का मंडप बनाकर तुलसी को सजाया जाता है, और शाम को दीप जलाकर विवाह की विधि होती है।
अगर पुरोहित उपलब्ध न हो तो घर की महिलाएँ स्वयं विधि कर सकती हैं: तुलसी को स्नान कराएँ, नया वस्त्र पहनाएँ, चूड़ी-बिंदी अर्पित करें, शालिग्राम को वर के रूप में स्थापित करें, गन्ने के मंडप में माला डालें, और पान-सुपारी-नारियल-बताशा-मिठाई चढ़ाकर आरती करें।
इस दिन तुलसी के नीचे दीप जलाना और परिवार साथ बैठकर प्रसाद खाना ही मुख्य भाव है। अगले दिन कई घरों में छप्पन भोग या विशेष प्रसाद भी बनाया जाता है।
- तुलसी स्नान, नया वस्त्र, चूड़ी-बिंदी-सिंदूर का श्रृंगार
- शालिग्राम या विष्णु-कृष्ण मूर्ति की स्थापना वर के रूप में
- गन्ने के मंडप में माला डालकर विवाह संस्कार
- पान-सुपारी, नारियल, बताशा, मिठाई, फल, खीर-पूरी का भोग
- आरती, प्रसाद वितरण और परिवार के साथ भोज
तुलसी विवाह की सामग्री
पूजा की पूरी सामग्री — गन्ने की डंडियाँ, तुलसी श्रृंगार, शालिग्राम, आँवला-बेर-अमरूद, पान-सुपारी, नारियल, बताशा और भोग की वस्तुएँ — मात्रा व अनुमानित कीमत के साथ हमारी तुलसी विवाह सामग्री लिस्ट में दी गई है।
कार्तिक मास के अन्य पर्वों के लिए देवउठनी एकादशी सामग्री लिस्ट और प्रदोष व्रत सामग्री लिस्ट देखें। शुभ समय मुहूर्त फाइंडर पर और पूरे पर्व का खर्च बजट कैलकुलेटर से देखें।
அடிக்கடி கேட்கப்படும் கேள்விகள்
तुलसी विवाह 2026 में कब है?
तुलसी विवाह कार्तिक मास में प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच होता है। ज़्यादातर घरों में इसे एकादशी या पूर्णिमा को किया जाता है और क्षेत्र के अनुसार तारीख बदलती है।
तुलसी का विवाह किसके साथ होता है?
तुलसी (वृंदा) का विवाह शालिग्राम या विष्णु-कृष्ण की मूर्ति के साथ होता है। शालिग्राम-तुलसी का जोड़ा विष्णु-लक्ष्मी का ही रूप माना जाता है।
तुलसी विवाह में गन्ना क्यों लगाया जाता है?
गन्ने की डंडियों से मंडप के चारों स्तंभ बनाए जाते हैं। गन्ना कार्तिक-अगहन के मौसम की फसल है और इसे मंगल व मिठास का प्रतीक माना जाता है, इसलिए यह तुलसी विवाह का सबसे पहचाना जाने वाला चिह्न है।
सौंजा छपन भोग क्या है?
बिहार-मिथिला में तुलसी विवाह के अगले दिन छप्पन (56) प्रकार की वस्तुएँ मिट्टी के छोटे भाँड़ों में सजाकर तुलसी को अर्पित की जाती हैं। इसे सौंजा छपन भोग कहा जाता है और भोग की सूची हर घर में अलग होती है।
मंगल अष्टक क्या है?
मंगल अष्टक महाराष्ट्र में तुलसी विवाह के दिन पढ़ा जाने वाला स्तोत्र है, जो विवाहित जीवन की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए पढ़ा जाता है। इसीलिए महाराष्ट्र में यह विधि मुख्यतः विवाहित महिलाएँ करती हैं।
क्षीराब्धि द्वादशी और तुलसी विवाह एक ही है?
तेलुगु क्षेत्र में तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल द्वादशी को क्षीराब्धि द्वादशी या उत्थान द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। यह देवउठनी का ही दक्षिणी रूप है — भगवान इस दिन शयन से उठते हैं और तुलसी का विवाह होता है।
क्या तुलसी विवाह घर पर बिना पुरोहित किया जा सकता है?
हाँ। घर की महिलाएँ स्वयं विधि कर सकती हैं — तुलसी को स्नान कराकर नया वस्त्र व श्रृंगार अर्पित करें, शालिग्राम को वर के रूप में स्थापित करें, माला डालें और पान-सुपारी, नारियल, बताशा, मिठाई तथा खीर-पूरी का भोग लगाएँ।
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