जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: पुरी, अहमदाबाद और कोलकाता की परंपरा, विधि और सामग्री

रथ यात्रा दुनिया का शायद एकमात्र ऐसा उत्सव है जिसमें भगवान स्वयं अपने मंदिर से निकलकर नगर की सड़कों पर आ जाते हैं — और भक्त नहीं, स्वयं भगवान रथ पर चलते हैं। पुरी में यह यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होती है।
यह गाइड तीन चीज़ें जोड़ती है: विधि (पहंडी, छेरा पहरा, रथ खींचना, बहुड़ा यात्रा), सामग्री (घर की पूजा के लिए खाजा, पान, तुलसी और पट्टचित्र), और तीन अलग परंपराएँ — पुरी की मूल यात्रा, अहमदाबाद की पुरानी शहर यात्रा और कोलकाता-महेश की इस्कॉन व सेरामपुर परंपरा।
रथ यात्रा की तिथि और तीनों रथों के नाम
रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को निकलती है, इसलिए अंग्रेज़ी तारीख हर साल बदलती है — आम तौर पर जून के अंत से जुलाई के मध्य के बीच। पुरी में यात्रा जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाती है, और नौ दिन बाद बहुड़ा यात्रा में लौटती है।
तीन दिनों तक तीन अलग रथ बनाए जाते हैं, हर साल नए, और हर रथ का अपना नाम, रंग, ऊँचाई और सारथी है। रथों की लकड़ी और निर्माण की विधि सदियों से एक जैसी है।
- नंदीघोष — जगन्नाथ जी का रथ, लाल-पीले रंग का, सबसे ऊँचा (लगभग 45 फुट), सारथी माता दारुका
- तालध्वज — बलभद्र जी का रथ, लाल-हरे रंग का, सारथी माता मौसला
- दर्पदलन (देवदलन) — सुभद्रा जी का रथ, लाल-काले रंग का, सारथी माता अर्जुन
- प्रत्येक रथ पर छत्र, चक्र, ध्वजा (पताका) और रस्सियाँ — रस्सी खींचना ही भक्त का सबसे बड़ा सौभाग्य माना जाता है
முழு சரிபார்ப்பு பட்டியலைப் பார்க்க
पुरी की विधि: पहंडी, छेरा पहरा और बहुड़ा यात्रा
यात्रा से पहले पहंडी होती है — तीनों देवताओं को पालकी पर बिठाकर मंदिर से रथों तक लाया जाता है, ढोल-नगाड़ों और "हरि बोल" के नाद के साथ। इसके बाद छेरा पहरा होता है: गजपति राजा सुनहरी झाड़ू से रथों को साफ़ करते हैं — यह प्रतीक है कि भगवान के सामने राजा भी सेवक है।
छेरा पहरा के बाद रथ खींचना शुरू होता है। नौ दिन बाद बहुड़ा यात्रा में देवता गुंडिचा से लौटते हैं, और उसके बाद सुना बेशा (स्वर्ण वेश), आधार पोड़ा और नीलाद्रि बिजे होता है — जब तीनों देवता फिर मंदिर में प्रवेश करते हैं।
- पहंडी — देवताओं को पालकी में रथ तक लाना
- छेरा पहरा — गजपति राजा द्वारा सुनहरी झाड़ू से रथ की सफ़ाई
- रथ खींचना — भक्तों द्वारा रस्सी खींचकर रथ को बड़ा दंड (ग्रैंड रोड) पर ले जाना
- बहुड़ा यात्रा — नौ दिन बाद वापसी की यात्रा
- सुना बेशा — स्वर्ण आभूषणों में देवताओं का दर्शन
- नीलाद्रि बिजे — मंदिर में अंतिम प्रवेश, रथ यात्रा का समापन
घर पर रथ यात्रा पूजा: क्या सामग्री चाहिए
जो लोग पुरी नहीं जा सकते, वे घर पर पट्टचित्र या लकड़ी की जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा मूर्ति स्थापित कर पूजा करते हैं। पुरी की पट्टचित्र परंपरा में तीनों देवता एक ही पट पर बने होते हैं — यह घर के मंदिर के लिए सबसे प्रामाणिक रूप माना जाता है।
पूजा की सामग्री सरल है: तुलसी दल (जगन्नाथ को तुलसी सबसे प्रिय है), पान के पत्ते, सुपारी, नारियल, केला और मौसमी फल, खाजा (पुरी का प्रसाद), चंदन, कुमकुम, घी के दीये और छोटा छत्र-ध्वजा।
- जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा की मूर्ति/पट्टचित्र या लकड़ी की प्रतिमा
- नया वस्त्र (तीनों के लिए अलग-अलग रंग), छोटा छत्र, ध्वजा और चक्र
- तुलसी दल, पान के पत्ते, सुपारी, नारियल, केला, मौसमी फल
- खाजा व पोड़ा पीठा (पुरी का पारंपरिक प्रसाद), गुड़, चीनी
- चंदन, कुमकुम, हल्दी, घी के दीये, अगरबत्ती, कपूर
- छोटा रथ (लकड़ी/कागज़ का) — बच्चों के साथ रथ सजाने की परंपरा
अहमदाबाद: पुराने शहर की 140+ साल पुरानी यात्रा
पुरी के बाद भारत की सबसे बड़ी रथ यात्राओं में अहमदाबाद की यात्रा गिनी जाती है, जो जमालपुर के जगन्नाथ मंदिर से निकलती है और पुराने शहर की गलियों से होकर गुज़रती है। यह परंपरा 19वीं सदी से चली आ रही है और इसे शहर की सांप्रदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
अहमदाबाद की यात्रा में हाथी-ऊँट, अखाड़े, ढोल-नगाड़े और सजे हुए रथ शामिल होते हैं। भीड़ बहुत बड़ी होती है, इसलिए रास्ते बदल दिए जाते हैं और पुलिस की व्यापक व्यवस्था रहती है।
- अहमदाबाद: जमालपुर जगन्नाथ मंदिर से प्रारंभ, पुराने शहर के रास्तों से गुज़रती यात्रा
- गुजरात के अन्य शहर: वडोदरा, सूरत, राजकोट में भी जगन्नाथ रथ यात्रा निकलती है
- अहमदाबाद में खाजा और पुरी-शैली का प्रसाद आम दुकानों पर मिलता है
कोलकाता, महेश और पश्चिम बंगाल की परंपरा
बंगाल की रथ यात्रा की अपनी अलग परंपरा है, और उसमें सबसे पुरानी मानी जाती है सेरामपुर (महेश) की यात्रा — जिसे बंगाल में रथ यात्रा की जन्मस्थली कहा जाता है। कोलकाता में इस्कॉन की रथ यात्रा मैदान से निकलती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।
बंगाल में "उल्टो रथ" की परंपरा भी है — यानी रथ के लौटने की यात्रा, जिसे अलग उत्सव की तरह मनाया जाता है। इसके अलावा गुप्तीपाड़ा, माहेश और अन्य इलाकों में सदियों पुरानी यात्राएँ निकलती हैं।
- महेश (सेरामपुर): बंगाल की सबसे पुरानी रथ यात्रा परंपरा
- कोलकाता: इस्कॉन मैदान से रथ यात्रा, और अगले सप्ताह उल्टो रथ
- गुप्तीपाड़ा व उत्तर कोलकाता: पुरानी पड़ोस-आधारित यात्राएँ
- दक्षिण भारत व अन्य शहर: बेंगलुरु, वृंदावन, दिल्ली, हैदराबाद में इस्कॉन केंद्रों की रथ यात्राएँ
नबकलेवर: जब जगन्नाथ जी का शरीर बदलता है
रथ यात्रा से जुड़ी एक अनोखी परंपरा है नबकलेवर — जब जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की लकड़ी की मूर्तियाँ नई बनाई जाती हैं। यह उस वर्ष होता है जिसमें आषाढ़ का अधिक मास पड़ता है, यानी लगभग हर 12 से 19 साल में।
नबकलेवर के वर्ष में रथ यात्रा और भी भव्य होती है। पुरानी मूर्तियों का दाह संस्कार नीलाद्रि बिजे के बाद किया जाता है — यह पूरी प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय मानी जाती है।
रथ यात्रा की सामग्री और यात्रा की तैयारी
घर की पूजा की पूरी सामग्री — मूर्ति, नया वस्त्र, तुलसी दल, पान-सुपारी, छत्र-ध्वजा, खाजा, घी के दीये — मात्रा के साथ हमारी जगन्नाथ रथ यात्रा सामग्री लिस्ट में दी गई है।
कृष्ण-संबंधी पर्वों के लिए जन्माष्टमी सामग्री लिस्ट और राधा अष्टमी सामग्री लिस्ट भी देखें। पूजा का शुभ समय मुहूर्त फाइंडर पर और खर्च का अनुमान बजट कैलकुलेटर से लगा सकते हैं।
அடிக்கடி கேட்கப்படும் கேள்விகள்
रथ यात्रा 2026 में कब है?
रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलती है, इसलिए तारीख हर साल बदलती है — सामान्यतः जून के अंत से जुलाई के मध्य के बीच। नौ दिन बाद बहुड़ा यात्रा होती है।
रथ यात्रा के तीन रथों के नाम क्या हैं?
नंदीघोष (जगन्नाथ जी, सबसे ऊँचा), तालध्वज (बलभद्र जी) और दर्पदलन या देवदलन (सुभद्रा जी)। हर रथ का रंग, सारथी और ऊँचाई अलग होती है।
छेरा पहरा क्या है?
छेरा पहरा में गजपति राजा सुनहरी झाड़ू से तीनों रथों को साफ़ करते हैं। यह प्रतीक है कि भगवान के सामने राजा भी सेवक है — यह रथ यात्रा की सबसे प्रतीकात्मक परंपरा मानी जाती है।
क्या रथ यात्रा घर पर मनाई जा सकती है?
हाँ। घर पर जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा की पट्टचित्र या लकड़ी की मूर्ति स्थापित कर तुलसी दल, पान-सुपारी, खाजा, नारियल और घी के दीयों से पूजा की जाती है, और छोटा रथ सजाया जाता है।
रथ यात्रा में तुलसी क्यों चढ़ाई जाती है?
जगन्नाथ जी को तुलसी दल सबसे प्रिय माना जाता है। पुरी की परंपरा में तुलसी के बिना भोग अधूरा माना जाता है, इसलिए रथ यात्रा और घर की पूजा दोनों में तुलसी अनिवार्य है।
अहमदाबाद की रथ यात्रा कहाँ से निकलती है?
अहमदाबाद की रथ यात्रा जमालपुर के जगन्नाथ मंदिर से निकलती है और पुराने शहर की गलियों से गुज़रती है। यह 19वीं सदी से चली आ रही परंपरा है और भारत की सबसे बड़ी रथ यात्राओं में गिनी जाती है।
नबकलेवर क्या होता है?
नबकलेवर वह परंपरा है जिसमें जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की नई लकड़ी की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। यह हर 12 से 19 साल में होता है और उस वर्ष रथ यात्रा विशेष भव्य होती है।
