छठ पूजा 2026: चार दिन की विधि, ठेकुआ-कसार की सामग्री और पटना-रांची-दिल्ली के घाट

छठ पूजा भारत का शायद सबसे कठिन और सबसे निष्ठापूर्ण पर्व है। इसमें भगवान सूर्य की उपासना होती है — लेकिन उलटे क्रम में: पहले डूबते सूरज को अर्घ्य, फिर अगली सुबह उगते सूरज को। व्रती 36 घंटे से अधिक निर्जला रहते हैं, पानी की एक बूँद भी नहीं।
यह गाइड चारों दिनों की विधि, ठेकुआ-कसार-दउरा-सूप की सामग्री, निर्जला व्रत के असली नियम, और पटना, रांची, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों के घाटों की जानकारी देती है — साथ में यह भी कि घर पर छठ कैसे करें अगर नदी-तालाब पास न हो।
छठ पूजा 2026: तिथि और चारों दिन का क्रम
छठ कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को पड़ती है — दिवाली के ठीक छह दिन बाद। इसलिए अंग्रेज़ी तारीख हर साल बदलती है। छठ का मुख्य दिन (संध्या अर्घ्य) इस साल 15 नवंबर 2026 है; बाकी तीन दिन इसी तिथि से पहले और बाद में आते हैं।
ध्यान दें कि छठ तिथि के अनुसार होती है, इसलिए अपने शहर का सटीक समय सूर्यास्त पर निर्भर करता है — अर्घ्य सूर्यास्त के समय ही दिया जाता है।
- नहाय खाय — पहला दिन: व्रती गंगा/तालाब में स्नान करते हैं, घर की सफाई, और कद्दू-भात व चने की दाल का सात्विक भोजन (कच्चा खाना, बिना प्याज़-लहसुन)
- खरना — दूसरा दिन: शाम को रोटी और गुड़ की खीर का प्रसाद, जिसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है
- संध्या अर्घ्य — तीसरा दिन (15 नवंबर 2026): व्रती घाट पर जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं — यही छठ का मुख्य दिन है
- उषा अर्घ्य — चौथा दिन: अगली सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य, पारण (प्रसाद खाकर व्रत खोलना), और आशीर्वाद
संपूर्ण चेकलिस्ट पहा
छठ का प्रसाद और सामग्री: ठेकुआ, कसार, दउरा और सूप
छठ की सामग्री की अपनी अलग पहचान है — यहाँ कोई फूल-माला या इत्र नहीं, बल्कि मिट्टी, बाँस और कच्चे अनाज की शुद्धता मायने रखती है। दउरा (बाँस की टोकरी) और सूप पर प्रसाद सजाकर अर्घ्य दिया जाता है; यही छठ की सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है।
दो नाम जो हर घर में सुने जाते हैं — ठेकुआ (आटा, गुड़ और घी से बना कुरकुरा प्रसाद) और कसार (चावल के आटे और गुड़ के लड्डू, जिन्हें अर्घ्य में रखा जाता है)। इनके बिना छठ का दउरा अधूरा माना जाता है।
- बाँस का दउरा (टोकरी), सूप, डाला और ढक्कन वाले बर्तन
- ठेकुआ, कसार (चावल के आटे के लड्डू), गुड़, चीनी, चावल का आटा, घी
- गन्ना (पत्तों-जड़ सहित), नारियल, केला, सुथनी, ओल, जिमीकंद, अदरक, नींबू, सिंघाड़ा, चीकू/अमरूद
- मिट्टी के दीये, अगरबत्ती, कच्चा दूध, पान-सुपारी, हल्दी, कुमकुम, लाल कपड़ा
- मिट्टी की हाथी व सुग्गा की मूर्ति (मिथिला-क्षेत्र की परंपरा), गाय का गोबर से बनी डाली
- नया कपड़ा — व्रती के लिए साड़ी/धोती-कुर्ता, और पूजा का ढक्कनदार बर्तन व थाली
निर्जला व्रत के असली नियम (जो नई व्रती सबसे ज़्यादा पूछती हैं)
छठ का व्रत खरना के बाद शुरू होता है और उषा अर्घ्य के बाद पारण तक — यानी लगभग 36 घंटे। इस दौरान व्रती जल ग्रहण नहीं करते, इसलिए इसे निर्जला कहा जाता है। यह व्रत शरीर से लंबा और कठिन है, और इसीलिए इसे श्रद्धा का पर्व कहा जाता है।
रसोई शुद्ध और अलग रखी जाती है; कई घरों में व्रती स्वयं या परिवार की कोई एक सदस्य चूल्हे पर कुछ नहीं चखती ("अनजोर")। कच्चा भोजन, लहसुन-प्याज़ का त्याग, और दिन में ज़मीन पर सोना आम परंपराएँ हैं।
अगर सेहत (मधुमेह, गर्भावस्था, बीमारी) के कारण निर्जला संभव नहीं है तो जल ग्रहण करते हुए भी व्रत और अर्घ्य किया जा सकता है — परंपरा में भाव आवश्यक है, हठ नहीं।
पटना और बिहार: छठ का सबसे बड़ा रंगमंच
पटना में छठ को शहर अपने घाटों पर उतार देता है। गंगा के किनारे कलेक्ट्रेट घाट, दीघा घाट, काली घाट, महेंद्रू घाट, कंगन घाट और गायघाट पर लाखों की भीड़ होती है। नहाय खाय से दो दिन पहले ही बाज़ारों में दउरा, सूप और ठेकुआ की खरीद शुरू हो जाती है।
पटना में छठ की तैयारी एक सामूहिक मुहिम बन जाती है — घाटों की सफाई, घाट तक पहुँचने के रास्ते, अस्थायी पुल, पीने का पानी और चिकित्सा कैंप। कई इलाकों में शाम को रास्ते बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि घाट तक पैदल ही पहुँचा जा सकता है।
- पटना: कलेक्ट्रेट घाट, दीघा, काली घाट, महेंद्रू, कंगन घाट, गायघाट — संध्या अर्घ्य के समय अत्यधिक भीड़, समय से पहले पहुँचें
- आरा व भोजपुर: जिले के गंगा घाटों पर मेले जैसा माहौल
- भागलपुर: बटेश्वर स्थान और गंगा घाट, बिहार के प्रमुख छठ केंद्रों में
- मुज़फ़्फ़रपुर व दरभंगा (मिथिला): ठेकुआ और कसार की यहाँ सबसे पुरानी परंपरा, मिट्टी की हाथी-सुग्गा मूर्ति भी
रांची, झारखंड और पड़ोसी राज्य
झारखंड में छठ को "छठ महापर्व" कहा जाता है और रांची में सबसे बड़े आयोजन होते हैं। रांची लेक (रांची झील), कांके डैम, हटिया डैम, स्वर्णरेखा नदी के घाट और राँची-पटना मार्ग के तालाब प्रमुख केंद्र हैं।
पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों (पुरुलिया, बाँकुड़ा), उत्तर प्रदेश के पूर्वी ज़िलों (वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, देवरिया, गाज़ीपुर), और झारखंड-बिहार की सीमा से लगे इलाकों में भी छठ घर-घर होती है।
- रांची: रांची झील, कांके डैम, हटिया डैम, स्वर्णरेखा घाट — शहर के सबसे बड़े अर्घ्य स्थल
- धनबाद व जमशेदपुर: शहर के तालाबों व डैमों पर अस्थायी घाट बनाए जाते हैं
- वाराणसी: अस्सी और दशाश्वमेध घाट पर गंगा के किनारे अर्घ्य
- देवरिया, गोरखपुर, बलिया: घाघरा व राप्ती नदी के घाटों पर छठ
घर से दूर: दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में छठ कहाँ होती है
बिहार-झारखंड-पूर्वी यूपी से बाहर रहने वाले लाखों परिवार छठ नहीं छोड़ते — वे घाट नहीं तो नदी-किनारे या समुद्र-तट ढूँढ लेते हैं, और कई शहरों में सरकार/समितियाँ अस्थायी घाट बनाती हैं।
अगर आप पहली बार घर से बाहर छठ कर रहे हैं तो पहले अपने इलाके की छठ पूजा समिति से संपर्क करें — कई शहरों में सामूहिक दउरा, सूप और प्रसाद व्यवस्था होती है और घाट का सही समय भी पता चल जाता है।
- दिल्ली-एनसीआर: यमुना के किनारे कालिंदी कुंज, आईटीओ, वज़ीराबाद, काली घाट; हर साल अस्थायी घाट बनते हैं — सुबह पहुँचना बेहतर
- मुंबई: जुहू बीच, वर्सोवा, अक्सा बीच, गिरगाँव चौपाटी — रेत पर अर्घ्य, सूर्यास्त के समय भारी भीड़
- बेंगलुरु: उल्सूर झील, बेलंदूर झील, हेसरघट्टा झील के किनारे सामूहिक छठ
- अहमदाबाद व सूरत: साबरमती और तापी के घाट, गुजरात में बिहारी-यूपी समुदाय का बड़ा आयोजन
- कोलकाता: हुगली के घाटों पर — बंगाल में छठ बिहारी परिवारों के साथ बंगाली परिवार भी करते हैं
अगर नदी या तालाब पास न हो: घर पर छठ कैसे करें
परंपरा में अर्घ्य जल में खड़े होकर दिया जाता है, इसलिए घर पर करने के लिए छत या आँगन में एक चौकोर हौज़/टब भरकर या बड़े कलश/ताँबे के पात्र में जल रखकर अर्घ्य दिया जाता है। जल की शुद्धता और पात्र की सफाई पर ध्यान दें।
दउरा और सूप को सूर्य की दिशा (पश्चिम में सूर्यास्त, पूर्व में सूर्योदय) की ओर रखें। संध्या अर्घ्य में पश्चिम की ओर मुँह करके खड़े हों, उषा अर्घ्य में पूर्व की ओर — यह सबसे ज़रूरी नियम है।
अगर स्वास्थ्य कारणों से निर्जला संभव नहीं, या आप पहली बार व्रत कर रहे हैं, तो घर के बड़े-बुज़ुर्गों या अपने पुरोहित से विधि और पारण का सही तरीका पूछ लें।
छठ की सामग्री और बजट
पूरी छठ सामग्री — दउरा, सूप, ठेकुआ के लिए आटा-गुड़-घी, कसार के लिए चावल का आटा, गन्ना, नारियल, मौसमी फल, मिट्टी के दीये — मात्रा और अनुमानित कीमत के साथ हमारी छठ पूजा सामग्री लिस्ट में दी गई है।
अगर सूर्य उपासना से जुड़ी और पूजाएँ करनी हैं तो नवग्रह शांति सामग्री और मकर संक्रांति सामग्री भी देखें। पूरे पर्व का खर्च बजट कैलकुलेटर से जोड़कर देख सकते हैं, और सूर्यास्त का सही समय मुहूर्त फाइंडर पर।
वारंवार विचारले जाणारे प्रश्न
छठ पूजा 2026 में कब है?
छठ कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पड़ती है। संध्या अर्घ्य (मुख्य दिन) 15 नवंबर 2026 है; नहाय खाय दो दिन पहले और उषा अर्घ्य अगली सुबह होता है। तिथि के अनुसार होने से तारीख हर साल बदलती है।
छठ में कुल कितने दिन का व्रत होता है?
छठ चार दिन का पर्व है — नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य। निर्जला व्रत खरना की शाम से उषा अर्घ्य के बाद पारण तक, यानी लगभग 36 घंटे का होता है।
छठ का प्रसाद क्या होता है?
मुख्य प्रसाद ठेकुआ (आटा-गुड़-घी) और कसार (चावल के आटे और गुड़ के लड्डू) हैं। इसके साथ गन्ना, नारियल, केला, सुथनी, ओल, जिमीकंद, अदरक और मौसमी फल दउरा और सूप में सजाए जाते हैं।
छठ पूजा में क्या नहीं चढ़ाया जाता?
छठ में फूल-माला, इत्र, केमिकल युक्त रंग या बाज़ार की बनी मिठाई नहीं चढ़ाई जाती। सामग्री मिट्टी, बाँस और कच्चे अनाज की शुद्ध होनी चाहिए, और रसोई अलग व शुद्ध रखी जाती है।
क्या छठ घर पर की जा सकती है अगर नदी पास न हो?
हाँ। छत या आँगन में साफ टब/हौज़ या बड़े ताँबे के पात्र में जल भरकर अर्घ्य दिया जाता है। संध्या अर्घ्य में पश्चिम और उषा अर्घ्य में पूर्व की ओर मुँह करना सबसे ज़रूरी नियम है।
छठ में संध्या और उषा अर्घ्य में क्या फ़र्क है?
संध्या अर्घ्य शाम को डूबते सूर्य को दिया जाता है (मुख्य दिन), और उषा अर्घ्य अगली सुबह उगते सूर्य को। यही छठ की खास बात है — डूबते सूरज की भी उपासना होती है, उगते की भी।
दिल्ली या मुंबई में छठ कहाँ करें?
दिल्ली में यमुना के किनारे कालिंदी कुंज, आईटीओ, वज़ीराबाद और काली घाट पर अस्थायी घाट बनते हैं। मुंबई में जुहू, वर्सोवा, अक्सा बीच और गिरगाँव चौपाटी पर छठ होती है। भीड़ से बचने के लिए समय से पहले पहुँचें।
