वरलक्ष्मी व्रत 2026: नोम्बु सरडू, तांबूलम, कोळुकट्टई — तमिलनाडु, कर्नाटक व तेलंगाना की विधि

वरलक्ष्मी व्रत — तमिल में वरलक्ष्मी नोन्बु, तेलुगु-कन्नड़ में वरमहालक्ष्मी व्रत — दक्षिण भारत का सबसे बड़ा लक्ष्मी पर्व है। यह श्रावण मास के उस शुक्रवार को होता है जो श्रावण पूर्णिमा से ठीक पहले पड़ता है।
"वर" का अर्थ वरदान है, यानी वरलक्ष्मी — वर देने वाली लक्ष्मी। यह गाइड विधि (कलश, नोम्बु सरडू, तांबूलम) और सामग्री (कोळुकट्टई, सुंदल, कलश के लिए नारियल-आम के पत्ते) दोनों को एक जगह रखती है।
वरलक्ष्मी व्रत 2026: तिथि और कथा
वरलक्ष्मी व्रत श्रावण मास के उस शुक्रवार को किया जाता है जो श्रावण पूर्णिमा से ठीक पहले आता है। कुछ परिवार श्रावण के दूसरे शुक्रवार को भी इसे करते हैं, इसलिए अपने घर की परंपरा देख लें।
कथा: विष्णु पुराण की परंपरा में वरलक्ष्मी व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव के कहने पर किया था। लोककथा में चारुमती नाम की एक पतिव्रता स्त्री का वर्णन है, जिसे स्वप्न में लक्ष्मी जी ने दर्शन दिए और श्रावण के इस शुक्रवार को व्रत करने का आदेश दिया। चारुमती ने विधिपूर्वक व्रत किया, अपने पड़ोस की स्त्रियों को भी बुलाया, और सबका घर धन-धान्य से भर गया।
इसीलिए वरलक्ष्मी व्रत की पहचान "अकेले पूजा" से ज़्यादा "साथ मिलकर पूजा" है — स्त्रियाँ एक-दूसरे को बुलाती हैं और तांबूलम देती हैं।
- तिथि = श्रावण पूर्णिमा से ठीक पहले वाला शुक्रवार
- कुछ परिवार श्रावण के दूसरे शुक्रवार को करते हैं
- व्रत मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ करती हैं — पति की दीर्घायु व घर की समृद्धि हेतु
- कई घरों में कुंवारी कन्याएँ भी अच्छे वर की कामना से करती हैं
ಸಂಪೂರ್ಣ ಪರಿಶೀಲನಾ ಪಟ್ಟಿ ನೋಡಿ
विधि 1: कोलम, कलश स्थापना और वरलक्ष्मी का मुख
सुबह स्नान के बाद घर के आँगन और पूजा स्थान पर कोलम (रंगोली) बनाई जाती है। फिर एक पीतल या ताँबे के कलश में जल भरकर उसमें हल्दी, कुमकुम और सिक्का डाला जाता है, कंठ पर आम के पत्ते लगाए जाते हैं और ऊपर नारियल रखा जाता है।
कलश को नया वस्त्र ओढ़ाया जाता है, और उस पर वरलक्ष्मी का मुख लगाया जाता है — कहीं चाँदी या पीतल की बनी हुई मुख-पट्टिका, तो कहीं कलश पर हल्दी-कुमकुम से स्वयं मुख बनाया जाता है। इसी रूप में माँ लक्ष्मी की स्थापना होती है।
कुछ घरों में कलश के बदले चाँदी की लक्ष्मी मूर्ति या "वरलक्ष्मी का मुख" वाली थाली स्थापित की जाती है। दोनों ही रूप प्रामाणिक माने जाते हैं।
- कोलम / रंगोली — आँगन व पूजा स्थान पर
- कलश — जल, हल्दी, कुमकुम, सिक्का, आम के पत्ते, नारियल
- कलश पर नया वस्त्र और वरलक्ष्मी का मुख (धातु की पट्टिका या हल्दी-कुमकुम से बना मुख)
- दीप, कपूर, अगरबत्ती, फूल, फल, तुलसी दल
विधि 2: नोम्बु सरडू — पवित्र धागा बांधना
वरलक्ष्मी व्रत की सबसे विशिष्ट वस्तु है नोम्बु सरडू (तमिल: நோம்பு சரடு) — हल्दी में रंगा पीला धागा, जिसमें 9 या 11 तार होते हैं और उसमें गाँठें लगाई जाती हैं। कई घरों में धागे के साथ हल्दी की एक छोटी गाँठ या सिक्का भी बाँधा जाता है।
यह धागा पूजा के दौरान कलश पर बाँधा जाता है और फिर दाहिनी कलाई पर बाँधा जाता है। धागा बाँधते समय व्रत का संकल्प लिया जाता है — कि यह व्रत परिवार की समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए किया जा रहा है।
अनेक परिवार इसे अगले साल के वरलक्ष्मी व्रत तक पहने रहते हैं, तो कई अगली सुबह ही उतार देते हैं। दोनों परंपराएँ प्रचलित हैं — घर के नियम से चलें।
- नोम्बु सरडू — हल्दी में रंगा पीला धागा, 9 या 11 तार
- पूजा में पहले कलश पर, फिर दाहिनी कलाई पर बाँधा जाता है
- साथ में हल्दी की गाँठ या सिक्का — समृद्धि का प्रतीक
- अवधि: अगले वरलक्ष्मी तक, या अगली सुबह तक — घर की परंपरा अनुसार
विधि 3: श्री सूक्त, अष्टोत्तर और व्रत कथा
कलश स्थापना के बाद श्री सूक्त का पाठ किया जाता है, फिर लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली (108 नाम) और अंत में वरलक्ष्मी व्रत की कथा सुनी जाती है। कथा सुनना व्रत का अनिवार्य अंग माना जाता है — व्रत करने वाली स्त्री और कथा सुनने वाली स्त्रियाँ साथ बैठती हैं।
व्रत का स्वरूप आम तौर पर एक समय का भोजन या फलाहार होता है — कई परिवार पूजा पूरी होने तक निर्जल या फलाहार रहते हैं, फिर नैवेद्य ग्रहण करते हैं।
पूजा के अंत में सुमंगली पूजा होती है: विवाहित स्त्रियों को बुलाकर उन्हें कुमकुम, हल्दी, चूड़ियाँ और तांबूलम दिया जाता है।
- श्री सूक्त का पाठ
- लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली — 108 नाम
- वरलक्ष्मी व्रत कथा — साथ बैठकर सुनना
- व्रत: एक समय भोजन या फलाहार, पूजा के बाद नैवेद्य
- सुमंगली पूजा — विवाहित स्त्रियों को कुमकुम, हल्दी, चूड़ियाँ, तांबूलम
नैवेद्य: कोळुकट्टई, सुंदल, पायसम
वरलक्ष्मी व्रत का सबसे पहचाना जाने वाला नैवेद्य है कोळुकट्टई (मोदकम) — चावल के आटे से बना, भाप में पका हुआ। यह दो प्रकार का बनाया जाता है: मीठा (गुड़ या चीनी और नारियल भरकर) और नमकीन (चना दाल की पूरन भरकर)।
इसके साथ सुंदल (उबली चना/काला चना, नारियल और राई की तड़का लगी), पायसम (खीर), वड़ा, इडली, पुलियोदरै (इमली चावल) और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं। कई घरों में नौ प्रकार के नैवेद्य बनाए जाते हैं।
प्रसाद में पान-सुपारी, केला, नारियल और मिठाई भी शामिल होती है, जो बाद में तांबूलम के रूप में बाँटी जाती है।
- कोळुकट्टई — मीठा (नारियल-गुड़) व नमकीन (चना दाल), भाप में पका
- सुंदल — उबला चना, नारियल, राई की तड़का
- पायसम / खीर, वड़ा, इडली, पुलियोदरै
- मौसमी फल, केला, नारियल, पान-सुपारी
- कई घरों में नौ प्रकार के नैवेद्य की परंपरा
तांबूलम और वयनम: दक्षिण की सबसे खास परंपरा
वरलक्ष्मी व्रत में पूजा के बाद जो होता है, वही इस पर्व की असली पहचान है — तांबूलम देना। विवाहित स्त्रियों को घर बुलाकर एक थाली में पान के पत्ते, सुपारी, हल्दी, कुमकुम, केला, नारियल, मिठाई, चूड़ियाँ और एक छोटा उपहार (वयनम / வயனம்) दिया जाता है।
यह वयनम एक कपड़े की गाँठ में बाँधकर दिया जाता है और इसमें अक्सर ब्लाउज़ का कपड़ा भी रखा जाता है। माना जाता है कि जितनी स्त्रियों को तांबूलम दिया जाए, उतना ही पुण्य मिलता है — इसीलिए कई घरों में 5, 9 या 11 स्त्रियों को बुलाया जाता है।
यह परंपरा इस व्रत को सामूहिक बनाती है। अगर आप पहली बार वरलक्ष्मी व्रत कर रहे हैं, तो तांबूलम की तैयारी को सामग्री सूची में सबसे ऊपर रखें — कई लोग इसे भूल जाते हैं और बाद में दौड़-भाग करनी पड़ती है।
- तांबूलम थाली: पान के पत्ते, सुपारी, हल्दी, कुमकुम, केला, नारियल, मिठाई
- वयनम — कपड़े की गाँठ में बाँधा उपहार, अक्सर ब्लाउज़ का कपड़ा
- चूड़ियाँ और कुमकुम देना — सुमंगली का सम्मान
- सामान्यतः 5, 9 या 11 विवाहित स्त्रियों को आमंत्रण
चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और अन्य शहरों की तैयारी
चेन्नई में वरलक्ष्मी नोन्बु की तैयारी हफ्ते भर पहले शुरू हो जाती है। मयलापुर की नॉर्थ माडा स्ट्रीट और कुमकुम-हल्दी की दुकानों पर भीड़ लगती है, और फूलों की खरीद के लिए कोयम्बेडु मार्केट जाता जाता है। कलश, मुख-पट्टिका और नोम्बु सरडू वहीं से लिए जाते हैं।
बेंगलुरु में मल्लेश्वरम और बसवनगुडी के बाज़ारों तथा कालासीपाल्यम और के.आर. मार्केट से फूल-पान मिलते हैं; औरतें पहले से ही कोळुकट्टई बनाने का सामान जमा कर लेती हैं। हैदराबाद में बेगम बाज़ार और सिकंदराबाद के बाज़ारों में हल्दी-कुमकुम, चूड़ियाँ और तांबूलम की थैलियाँ सबसे ज़्यादा बिकती हैं।
कोयंबटूर, मदुरै, तिरुचिरापल्ली, सलेम, मैसूर और मंगलुरु में भी यह पर्व बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। महाराष्ट्र और गोवा के कुछ हिस्सों में भी श्रावण के इस शुक्रवार को वरलक्ष्मी पूजा होती है।
- चेन्नई: मयलापुर (नॉर्थ माडा स्ट्रीट), कोयम्बेडु फूल बाज़ार
- बेंगलुरु: मल्लेश्वरम, बसवनगुडी, के.आर. मार्केट, कालासीपाल्यम
- हैदराबाद: बेगम बाज़ार, सिकंदराबाद — हल्दी-कुमकुम, चूड़ियाँ, तांबूलम
- कोयंबटूर, मदुरै, तिरुचिरापल्ली, सलेम, मैसूर, मंगलुरु
- पुणे-मुंबई व गोवा के कुछ घरों में भी श्रावण शुक्रवार की लक्ष्मी पूजा
वरलक्ष्मी व्रत और दिवाली की लक्ष्मी पूजा में फ़र्क
दोनों लक्ष्मी की पूजा हैं, पर अलग-अलग हैं। दिवाली की लक्ष्मी पूजा कार्तिक अमावस्या को पूरे भारत में होती है और उसमें धन-समृद्धि तथा व्यापार पर ज़ोर रहता है। वरलक्ष्मी व्रत श्रावण के शुक्रवार को दक्षिण भारत में होता है और इसका केंद्र पति की दीर्घायु, सौभाग्य और परिवार की समृद्धि है।
विधि में भी फ़र्क है — यहाँ कलश पर वरलक्ष्मी का मुख, नोम्बु सरडू और तांबूलम-वयनम केंद्रीय हैं, जो उत्तर भारत की लक्ष्मी पूजा में नहीं होते।
- दिवाली लक्ष्मी पूजा: कार्तिक अमावस्या, पूरे भारत में
- वरलक्ष्मी व्रत: श्रावण पूर्णिमा से पहले शुक्रवार, मुख्यतः दक्षिण भारत
- वरलक्ष्मी में विशेष: कलश पर मुख, नोम्बु सरडू, तांबूलम-वयनम
वरलक्ष्मी व्रत की सामग्री
पूजा की पूरी सामग्री — कलश, नारियल, आम के पत्ते, वरलक्ष्मी का मुख, हल्दी, कुमकुम, नोम्बु सरडू का धागा, चूड़ियाँ, तांबूलम के लिए पान-सुपारी तथा कोळुकट्टई-सुंदल-पायसम की सामग्री — मात्रा व अनुमानित कीमत के साथ हमारी वरलक्ष्मी व्रत सामग्री लिस्ट में दी गई है।
लक्ष्मी से जुड़े अन्य पर्वों के लिए लक्ष्मी पूजा सामग्री लिस्ट और श्रावण के पर्वों के लिए रक्षा बंधन सामग्री लिस्ट देखें। शुभ समय मुहूर्त फाइंडर पर और खर्च का अनुमान बजट कैलकुलेटर से लगाएँ।
ಆಗಾಗ್ಗೆ ಕೇಳಲಾಗುವ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳು
वरलक्ष्मी व्रत 2026 में कब है?
वरलक्ष्मी व्रत श्रावण मास के उस शुक्रवार को होता है जो श्रावण पूर्णिमा से ठीक पहले आता है। कुछ परिवार श्रावण के दूसरे शुक्रवार को करते हैं, इसलिए घर की परंपरा देख लें।
नोम्बु सरडू क्या है?
नोम्बु सरडू हल्दी में रंगा पीला धागा है, जिसमें 9 या 11 तार और गाँठें होती हैं। इसे पूजा में पहले कलश पर और फिर दाहिनी कलाई पर बाँधा जाता है — यह व्रत के संकल्प का प्रतीक है।
वरलक्ष्मी व्रत का मुख्य नैवेद्य क्या है?
कोळुकट्टई (मोदकम) — चावल के आटे से बना भाप में पका व्यंजन, मीठा (नारियल-गुड़) और नमकीन (चना दाल) दोनों रूपों में। इसके साथ सुंदल, पायसम, वड़ा, इडली और पुलियोदरै अर्पित किए जाते हैं।
तांबूलम और वयनम क्या होता है?
तांबूलम एक थाली है जिसमें पान के पत्ते, सुपारी, हल्दी, कुमकुम, केला, नारियल, मिठाई और चूड़ियाँ रखकर विवाहित स्त्रियों को दी जाती हैं। वयनम वह उपहार है जो कपड़े की गाँठ में बाँधकर दिया जाता है, जिसमें अक्सर ब्लाउज़ का कपड़ा भी होता है।
वरलक्ष्मी व्रत कौन कर सकता है?
यह मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु और घर की समृद्धि के लिए करती हैं। कई परिवारों में कुंवारी कन्याएँ भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं।
वरलक्ष्मी व्रत और दिवाली की लक्ष्मी पूजा में क्या फ़र्क है?
दिवाली की लक्ष्मी पूजा कार्तिक अमावस्या को पूरे भारत में होती है और धन-व्यापार पर केंद्रित है। वरलक्ष्मी व्रत श्रावण के शुक्रवार को दक्षिण भारत में होता है और पति की दीर्घायु व परिवार की समृद्धि पर केंद्रित है — इसमें कलश पर वरलक्ष्मी का मुख, नोम्बु सरडू और तांबूलम विशेष हैं।
वरलक्ष्मी व्रत में व्रत कैसे रखा जाता है?
आम तौर पर एक समय का भोजन या फलाहार रखा जाता है। कई परिवार पूजा पूरी होने तक फलाहार या निर्जल रहते हैं और पूजा के बाद नैवेद्य ग्रहण करते हैं।
ಸಂಬಂಧಿತ ಲೇಖನಗಳು

दिवाली 2026 संपूर्ण गाइड: 6–10 नवंबर, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त, रंगोली और शहर-वार उत्सव
धनतेरस से भाई दूज तक 5 दिन, लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त, रंगोली-दीये की सजावट और दिल्ली-मुंबई-कोलकाता-बेंगलुरु तक — दिवाली 2026 का शहर-वार पूरा गाइड।

दिवाली 2026: लक्ष्मी पूजा सामग्री लिस्ट, मुहूर्त और तैयारी की पूरी गाइड
धनतेरस से भैया दूज तक — दिवाली 2026 की पूरी सामग्री लिस्ट, पूजा विधि, मुहूर्त और बजट टिप्स एक ही जगह।